स्थापना १९७४
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अध्याय 10 / 11

कवितायें

यह पुस्तक १९७४ में हिंदी में लिखी गई थी और यहाँ ठीक वैसे ही प्रस्तुत है जैसे प्रकाशित हुई थी — इसका अनुवाद नहीं किया गया है। मेनू व नेविगेशन भाषा बदलते हैं; पुस्तक का पाठ नहीं बदलता।

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प्यारे लाल भण्डारी द्वारा रचित कवितायें, जो नमक सत्याग्रह (१९३०) व उसके बाद व्यक्तिगत सत्याग्रह-भारत छोड़ो आन्दोलन (१९४१-४२) के समय गाई गईं।

डगमग डोले फिरंगी की नैय्या
गांधी की आंधी जवाहर को अहलो,
मोती के चक्कर से कौन बचय्या।
डूबन से अब तो जो बची है,
हमसे विमुख हैं हमारे ही भय्या। (१)

रोज़ जाती है पुलिस ऊधम मचाने के लिये,
हर तरह से गांव वालों का डराने के लिये।
काम रुक सकता नहीं गांधी का यह हरगिज़ मगर,
बात रह जायेगी कहने को जमाने के लिये।
इस गुलड़िया के जमींदारों ने गांधी के लिये,
एक पल्ला मिट्टी न दी सांभर बनाने के लिये। (२)

नोट—यह कविता नमक कानून तोड़ने से पहले बनाई गई थी, बाद को वातावरण अनुकूल होने पर भरपूर मिट्टी मिली।

नमक बन रहा था उस समय यह कविता कोरस में गाई जा रही थी:—

तो देखो तमाशा यह क्या हो रहा है,
कि कानून इंगलिश फ़ना हो रहा है।
नमक था जो कीमत में कुछ कौड़ियों का,
वह अब गौहरे बे बहा हो रहा है।
है गांधी की बरकत कि दुश्मन के ऊपर,
तबाही का आलम बपा हो रहा है।

गुलड़िया के बाद बदायूँ से ११ वालन्टियर्स का जत्था जब नमक बनाने बरेली रवाना हुआ, उस समय गाई गई कविता:—

यह कौमी सिपाही किधर जा रहे हैं,
हुकूमत से करने समर जा रहे हैं।
गुलड़िया से लेकर नमक कर की अर्थी,
जलाने बरेली शहर जा रहे हैं।
वहाँ जा के तोड़ेंगें कानूने इंगलिश,
बदायूँ से ग्यारह नफर जा रहे हैं।

जब बरेली से नमक कानून भंग कर नमक बन चुका तब निम्नलिखित कविता गाई गई:—

खुदा का शुक्र है हमने विजय पाई विजय पाई,
बदायूँ से किया हमला बरेली में फतह पाई।
सुना था और शहरों में भरे हैं जेल ख़ाने भी,
कहीं लाठी कहीं डंडा कहीं गोली भी बरसाई।
तमन्ना लेके आये थे बसेंगे जेल में लेकिन,
न हमको याँ बरेली की पुलिस तक भी नज़र आई।

बाद को जब जत्था बदायूँ वापस आकर यहाँ के विदेशी कपड़े की दुकानों पर पिकेटिंग शुरू किया गया, उस समय गाई गई कविता:—

यह मन्त्र हमें सत्याग्रह का बतला दिया वीर जितेन्द्र ने,
सच्ची आजादी का मार्ग दिखा दिया वीर जितेन्द्र ने।
या तेल छिड़क कर जलवा दे, या मरेंगे बे दाना पानी,
प्रण यही हमारा है, हमको बतला दिया वीर जितेन्द्र ने।

मर मिटो देश हित पे ऐ वीरो, आख़िर तो कभी मरना होगा,
है संकट में भारत माता, आज़ाद इसे करना होगा।
सीलें तोड़ी धोखा भी दिया कपड़ा भी विदेशी मंगवाया,
बस इसी लिए हर दुकान पर सत्याग्रह करना होगा।
अब तक का जुर्माना देकर आगे को अहद नामा लिखकर,
जो कुछ हैं विदेशी वस्त्र उन्हें भी सील बन्द करना होगा।
गर देर लगाओगे उसमें तो शर्त और बढ़ जायेगी,
क्या ख़ता हमारी है भाई जो करोगे वह भरना होगा।

नोट—स्त्रियों के साथ जुलूस में गाई गई कविता:—

देवियाँ जिस दिन से आईं जंग के मैदान में,
लग गया बट्टा तुम्हारी मर्दुं भी की शान में।
(या) लग गया बट्टा पुलिस वालो तुम्हारी शान में।
हिन्द के ही आबो दाने से हुयें हो परवरिश,
हिन्द की आबो हवा दरकार है हर आन में।
बाद मुरदन कोई भी अंग्रेज पूछेगा नहीं,
हिन्द वाले ही तुम्हें पहुंचायेंगे शमशान में।

नोट—गुलड़िया जाते समय तथा उससे पहले नेताओं की गिरफ़्तारी के सम्बंध में जो कवितायें गाई गईं:—

अब बदायूँ में भी उसने हुक्म जारी कर दिया,
पांच को तो कृष्ण मन्दिर का पुजारी कर दिया।
अव्वलन उसने बदन सिंह के बदन को कैद कर,
खेलने से बन्द पहले ही खिलाड़ी कर दिया।
फेर मंगलसेन के मंगल में जा डाला खलल,
साथ ही कल्याण को कल्याणकारी कर दिया।
माइओ रघुवीर को बनवास रूपी जेल में,
पृथ्वी के भार ने जाने को आरी कर दिया।
कृष्ण मन्दिर और वहाँ दर्शन हो श्री रघुवीर के,
जब सुना तुलसी ने खुद को भी पुजारी कर दिया।

अन्य फुटकर कवितायें इस प्रकार हैं:—

वे ख़ता हजारों खून किये इन खूनी पगड़ी वालों ने,
कम ज़रफों नमक हरामों ने इन खाकी वर्दी वालों ने।
कहीं जलसों पर डंडे पटके, कहीं गोली चलाई जुलूसों पर,
खुद फेंक के ईंट किये फायर इन खूनी पगड़ी वालों ने।

हटा सकता नहीं कोई हमारा ख्याल चर्खे से,
कि हम करके दिखा देंगे उन्हें पामाल चर्खे से।
हमारा माल खा खा कर बने हो सुर्ख़रू साहब,
बदल जायगी स्याही में यह सूरत लाल चर्खे से।
हमें बरबाद करके भर लिया है अपना घर जालिम,
वतन में खींचे लायेंगे सभी धनमाल चर्खे से।
न घबराओ अभी साहब कती है सेर में पौनी,
हिला देंगे जमीनो आस्मां पाताल चर्खे से।
था माज़ी शानदार अपना तो होगा क्यों न मुस्तक़बिल,
हिला रखा है जो हमने जमाना हाल चर्खे से।
जमाना आ रहा है जल्द हम आज़ाद होकर के,
करेंगे दूर भारत का सभी जंजाल चर्खे से।
करेंगे इक बड़ा इजलास तब हम शहरे देहली में,
बनाया और सजाया जायगा पण्डाल चर्खे से।
चुनेंगे राष्ट्रपति उस दिन जवाहर लाल को उसमें,
गले में उनके डालेंगे बना जैमाल चर्खे से।
खड़े होंगे अभी बापू उन्हें आशीष देने को,
स्वर्ग से फूल बरसायेंगे मोती लाल चर्खे से।
करेगा सत्य हिन्दुस्तान का हर मर्दो-ज़न उस दिन,
गई सदियों की आज़ादी का इस्तक़बाल चर्खे से।

'चर्ख़े से' की रदीफ़ पर बनी यह लम्बी कविता मुनाफ़ाखोर अफ़सरों को सम्बोधित है, यह भविष्यवाणी करते हुए कि चरखा एक दिन उनका हिसाब बराबर करेगा। कविता का समापन दिल्ली में होने वाले एक बड़े अधिवेशन की कल्पना से होता है, जिसमें जवाहरलाल नेहरू को 'राष्ट्रपति' चुना जायेगा, बापू आशीष देंगे और मोतीलाल स्वर्ग से फूल बरसायेंगे।

सन् १९४२ के आन्दोलन के समय प्यारे लाल भण्डारी सम्भल के गांधी आश्रम पर काम कर रहे थे। एक कवि सम्मेलन में उन्होंने नीचे लिखी कविता सुनाई :-(समस्या थी हथकड़ियों की झनकार मधुर)

जिस जगह हथकड़ी देखते ही सब भाग जायेंगे इधर उधर,
उस जगह समस्या सी है हथकड़ियों की झंकार मधुर।
जिसने जाकर के देखा है हैदराबाद की जेलों को,
उनसे जाकर के पूछ न लो क्या कहती थी झंकार मधुर।
जिनके साथी जेलों में हों, जिनकी माता बन्धन में हो,
लीडरी रहे कायम अपनी दिन रात वह इसी उलझन में हो।
पोशाके लीडरी पहिने हैं और मौज उड़ाते हिल मिल हैं,
गर जेल को पूछो कह देते पब्लिक यहाँ की बुज़दिल है।
लगता हो जिन्हें व्यापार मधुर, बीबी बच्चों का प्यार मधुर,
ऐसों के लिये बस निकल रही हथकड़ियों से धिक्कार मधुर।
इसलिए उठो सम्भल वालो नेताओं की परवाह न कर,
रफ्तार जमाने की समझो मत बगलें झंको इधर उधर।
आखिर तो इक दिन मरना है रहता है कौन अमर जग में,
बलिदान देश पर जो होते कर जाते नाम अमर जग में।
इस समय सत्य वीरों के लिए लगते हैं दो व्यापार मधुर,
बस गोली की बौछार मधुर, हथकड़ियों की झंकार मधुर।

नोट:—उभयानी में १९३० के आन्दोलन के समय एक जुलूस में गाई गई कविता:—

लीडर प्लीडर राय बहादुर चेरमैन हूँ चुंगी का,
मैं हूँ सबसे बड़ा अफीसर हर एक भिश्ती भंगी का।
ओहदे का मगरूर नहीं हूँ काम सभी कर सकता हूँ,
गर कहीं मुजरा होता देखूं, करूँ काम सारंगी का।
कांग्रेस वाले चन्दा मांगें तो यूं कह देता हूँ,
हरगिज दे सकता नहीं तुमको मैं हूँ गुलाम फिरंगी का।
पूजा पाठ रोज करता हूँ बैठ के अन्दर कोठी के,
ओहदा कायम रहे हमेशा कहूँ ध्यान बजरंगी का।
दुआ मांगता रहता हूँ मैं आठ पहर यही दिल से,
हनुमान बाबा दुनिया में होवे राज फिरंगी का।

१९३१ में बदायूँ जेल में बनाई कविता:—

यारो सुनाऊँ क्या तुम्हें मैं जेल की तिकड़म,
कैदी को मजा देती है यों जेल की तिकड़म।
दो पैसे वाली बीड़ी मिले चार डबल में,
हर चीज दिलाती है यहाँ जेल की तिकड़म।
भण्डारी को देकर के दुअन्नी में रोटियाँ,
भर पेट खिलाती हैं यहाँ जेल की तिकड़म।
दो चार आने दे दिये गर डाक्टर को,
रोजाना पिलाती है दूध जेल की तिकड़म।

नोट—१९४१ में बदायूँ जेल के अन्दर मुशायरे की तरह थी। 'ग़म रहा जब तक कि दम में दम रहा' — उस पर भण्डारी जी ने कविता बनाई:—

जिन्दगी भर फिक्र का आलम रहा,
जेल खाने में न कोई गम रहा।
हां मगर जब तक हवालाती रहा,
गम रहा लेकिन वो बेशो कम रहा।
नाप दी जिस दिन सजा सरकार ने,
बाहरी दुनिया से नाता कम रहा।
लेके आये हैं जो थोड़ी सी सजा।
उनको आने का मजा कुछ कम रहा।
जेल में रह कर किसे परवाह है,
शहर में किस भाव का गन्दुम रहा।
वक्त पर खाना मिले खातिर के साथ,
जेल क्या ससुराल से कुछ कम रहा।
जेल की दुनिया में हम कैसे कहें।
गम रहा जब तक कि दम में दम रहा।

नोट:—स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद गुरु गोविन्द सिंह के जन्म दिवस पर निम्नलिखित कविता पढ़ी गई:—

आगाज कब हुआ था यहाँ सिख पंथ का,
यवनों ने सहारा लिया था जब कुपन्थ का।
जब बादशाहे वक्त भी मजहब में चूर था,
आँखों में सिर्फ उसकी खुदी का सरूर था।
अन्याय अत्याचार का हर सू जहूर था,
ऐसे समय में आना गुरु का जरूर था।

आकर गुरु ने उनके अनाचार को रोका,
अन्याय को रोका व दुराचार को रोका।
तब्दीले धर्म के गर्म बाजार रोका,
मजहब के नाम पर बढ़े व्यभिचार को रोका।
अन्याय के विरोध में इक फौज बनाकर,
और पंच ककारों से लिया उसको सजाकर।

फिर आ गये मैदान में रण भेरी बजाकर,
पीछे कदम हटाते थे दुश्मन को भगाकर।
इस धर्म युद्ध में ही तो दो पुत्र गंवाये,
लेकिन नहीं माथे पे जरा भी शिकन लाये।
कुछ हिन्दू राज्य भी गुरु की राह में आये,
उनके भी युद्ध करके सभी नाम घटाये।

इस पन्थ के ही एक गुरु नानक फ़कीर थे,
हिन्दू भी मुसलमान भी उनके मुरीद थे।
हिन्दू से दोस्ती न थी मुस्लिम से लड़ाई,
अन्याय के विरोध में तलवार उठाई।

गुरुओं में हमारे न कहीं रागद्वेष था,
अन्याय अत्याचार से उनको विरोध था।
मैं पूंछता हूँ आपसे ए सिख भाइयो,
क्या दूर कर दिया है राग द्वेष को।

हिन्दू अगर न्याय का लेता है सहारा,
उनका विरोध करना है कर्तव्य तुम्हारा।
निर्दोष मुसलमान को गर कोई सताये,
हर सिख का कर्तव्य है कि उसको बचाये।

इसके खिलाफ़ करता है वह सिख नहीं है,
और मेरी तुच्छ बुद्धि में गुरु भक्त नहीं है।
बेटे से बदला बाप का लेना नहीं बजा,
जो कोई जुर्म करता है मिलती उसे सज़ा।

मुजरिम को सज़ा देना हुकूमत का काम है,
पब्लिक यह समझ जाये तो झगड़ा तमाम है।
कन्घा कड़ा व कच्छ केश पाँचवीं कृपाण,
इस फ़ौज की वर्दी के रूप में थे ये निशान।

अब मुल्क है आज़ाद और अपनी है हुकूमत,
मिल जाने चाहिये सभी भारत के मज़ाहिब।
अब अपनी-अपनी वर्दियाँ हर एक उतार दे,
और एक कौम बनके ज़माने को दिखा दे।

दुनिया में आने वाला है एक मौत का तूफ़ान,
पश्चिम में नज़र आने लगे उसके भी सामान।
जिस कौम की किश्ती का होगा नेक नाखुदा,
बाशिन्दगाने मुल्क में भी होगी एकता।

तो एक के बजाय आयें सैकड़ों तूफ़ान,
ज़ाया नहीं हो सकती है इक बच्चे की भी जान।
गांधी से बढ़ के नाखुदा मिलना मुहाल है,
पर इत्तहादे कौम का बाकी सवाल है।

सिंधी सभाई सिख्ख सब हिन्दू व मुसलमां,
गांधी के रास्ते पर जो चलने लगे यहाँ।
तो सारी मन्ज़िलों से यह किश्ती उबूर हो,
भारत की सभी मुश्किलें मिन्टों में दूर हों।

उस समय गुन्नौर व सहसवान के वालन्टियरों ने जत्था बनाकर खंजरी लेकर गांव-गांव में प्रचार किया। इनके गानों के कुछ अंश —

भारत लूट लियो अंग्रेजुन इनको जइयो सत्यानास,
गेहूँ चना बाजरा ले गये, ले गये रुई कपास।
गऊ माता पै छूरी चलाय दई, ऐसे बदीकमास,
जतन कर रखियों ये आजादी को भण्डा,
ऐसी कोशिश करते रहियो भाजें सभी गुरन्डा।
भारत मां के लाल शीघ्र तोड़ गुलामी गन्डा।

कैम्प जेल लखनऊ (जनवरी १९३१)

(१) जुल्म हम पर शबो रोज़ ढाये
सारे यू॰पी॰ के कैदी सताये
जेल लखनऊ में है एक बनाई
नाम रखा है कैम्प जिसका भाई.........(१)

छ: है बिजली के खम्बे लगाये
टीन के सारे बैरक बनाये
सियासी कैदी सभी सिलसिले से
रोज़ आते रहे हर जिले से
सौ थे अखलाकी कैदी बुलाये
वह ही अफसर हमारे बनाये.........(२)

आदमी दो सौ और बीस टट्टी
उनके दरवाजे पर भीड़ इकटठी
रोज दोनों समय हो ही जाय
एक नल पर ही सारे जुटाये.........(३)

हमको पीटा घसीटा सताया
और बेतों का भय भी दिखाया
जुल्म का था नहीं हम पेटा
छोटे बच्चों ने कोल्हू चलाये..........(४)

(२) जेलर ने जुल्म गुजारे सब कैदी भूखन मारे
कैम्प जेल लखनऊ बनाई गवरमेन्ट ने यूपी में
दमन नीति का किला बनाकर खड़ा कर दिया यूपी में
सब जेलों से कैदी आये जितनी भी हैं यू॰पी॰ में
हर एक जिले के पाँच-पाँच सब कर दिये न्यारे-न्यारे
जेलर ने जुल्म गुजारे...

कांटेदार तार को चहुंदिशि बाढ़ गईल गवाई थी
उसके बाद चार दीवारी टीन की गई बनाई थी
मौसम के प्रतिकूल टीन की बैरक खड़ी कराई थी
सरकिल तीन बनाये जिनके जेलर ने न्यारे-न्यारे
जेलर ने जुल्म गुजारे...